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पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द का जनà¥à¤® 31 जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ, 1880 को वाराणसी के निकट लमà¥à¤¹à¥€ गà¥à¤°à¤¾à¤® में हà¥à¤† था। उनके पिता अजायब राय पोसà¥à¤Ÿ ऑफ़िस में कà¥à¤²à¤°à¥à¤• थे। वे अजायब राय व आननà¥à¤¦à¥€ देवी की चौथी संतान थे। पहली दो लड़कियाठबचपन में ही चल बसी थीं। तीसरी लड़की के बाद वे चौथे सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर थे। माता पिता ने उनका नाम धनपत राय रखा।सात साल की उमà¥à¤° से उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤• मदरसे से अपनी पढ़ाई-लिखाई की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ की जहाठउनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤• मौलवी से उरà¥à¤¦à¥‚ और फ़ारसी सीखी। जब वे केवल आठसाल के थे तà¤à¥€ लमà¥à¤¬à¥€ बीमारी के बाद आननà¥à¤¦à¥€ देवी का सà¥à¤µà¤°à¥à¤—वास हो गया। उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली परंतॠपà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द को नई माठसे कम ही पà¥à¤¯à¤¾à¤° मिला। धनपत को अकेलापन सताने लगा।किताबों में जाकर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤•ून मिला। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कम उमà¥à¤° में ही उरà¥à¤¦à¥‚, फ़ारसी और अà¤à¤—à¥à¤°à¥‡à¤œà¤¼à¥€ साहितà¥à¤¯ की अनेकों किताबें पढ़ डालीं। कà¥à¤› समय बाद उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने वाराणसी के कà¥à¤µà¥€à¤‚स कॉलेज में दाख़िला ले लिया।1895 में पंदà¥à¤°à¤¹ वरà¥à¤· की आयॠमें उनका विवाह कर दिया गया। तब वे नवीं ककà¥à¤·à¤¾ में पढ़ रहे थे। लड़की à¤à¤• समà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ ज़मीदार परिवार से थी और आयॠमें उनसे बढ़ी थी। पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द ने पाया कि वह सà¥à¤µà¤à¤¾à¤µ से बहà¥à¤¤ à¤à¤—ड़ालू है और कोई ख़ास सà¥à¤‚दर à¤à¥€ नहीं है। उनका यह विवाह सफ़ल नहीं रहा। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने विधवा-विवाह का समरà¥à¤¥à¤¨ करते हà¥à¤ 1906 में बाल-विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया। उनकी तीन संताने हà¥à¤ˆà¤‚–शà¥à¤°à¥€à¤ªà¤¤ राय, अमृत राय और कमला देवी शà¥à¤°à¥€à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¤à¤µà¥¤1897 में अजायब राय à¤à¥€ चल बसे। पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द ने जैसे-तैसे दूसरे दरà¥à¤œà¥‡ से मैटà¥à¤°à¤¿à¤• की परीकà¥à¤·à¤¾ पास की। तंगहाली और गणित में कमज़ोर होने की वजह से पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बाद में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤µà¥‡à¤Ÿ से इंटर व बी.à¤. की परीकà¥à¤·à¤¾ उतà¥à¤¤à¥€à¤°à¥à¤£ की।वाराणसी के à¤à¤• वकील के बेटे को 5 रà¥. महीना पर टà¥à¤¯à¥‚शन पढ़ाकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ी। कà¥à¤› समय बाद 18 रà¥. महीना की सà¥à¤•ूल टीचर की नौकरी मिल गई। सनॠ1900 में सरकारी टीचर की नौकरी मिली और रहने को à¤à¤• अचà¥à¤›à¤¾ मकान à¤à¥€ मिल गया।धनपत राय ने सबसे पहले उरà¥à¤¦à¥‚ में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखना शà¥à¤°à¥‚ किया। बाद में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने हिंदी में पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द के नाम से लिखा। पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द ने 14 उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸, 300 से अधिक कहानियाà¤, नाटक, समीकà¥à¤·à¤¾, लेख, समà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤•ीय व संसà¥à¤®à¤°à¤£ आदि लिखे। उनकी कहानियों का अनà¥à¤µà¤¾à¤¦ विशà¥à¤µ की अनेक à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ं में हà¥à¤† है। पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द ने मà¥à¤‚बई में रहकर फ़िलà¥à¤® ‘मज़दूर’ की पटकथा à¤à¥€ लिखी।पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द काफ़ी समय से पेट के अलसर से बीमार थे, जिसके कारण उनका सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ दिन-पर-दिन गिरता जा रहा था। इसी के चलते 8 अकà¥à¤¤à¥‚बर, 1936 को क़लम के इस सिपाही ने सब से विदा ले ली